Sunday, 16 March 2014

ॐ सृष्टि की हर वस्तु परिवर्तनशील-- लेकिन शाश्वत है कहा जाता है- ब्रह्म सत्य ,जगत मिथ्या। लेकिन जिसका निर्माण ब्रह्म से हुआ है,वह मिथ्या कैसे हो सकता है?यह बात थोड़ी जानने ,समझने योग्य है।प्रभु प्रेरणा से मैं अपनी क्षुद्र मति से कुछ समझने-समझाने की कोशिश कर रही हूँ।परमतत्व परमेश्वर की एक से अनेक होने प्रक्रिया ही सृष्टि कहलायी,यह सभी जानते हैं प्रभु की अनन्त सृष्टि में क्या-क्या छिपा हुआ है ये तो वे ही जाने।प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संसार की हर वस्तु की निर्मिति ईश्वर द्वारा ही की गयी है।जल,थल,नभ,जड़ चेतन,चराचर सम्पूर्ण जगत सभी कुछ प्रभु का ही निर्माण है।यद्यपि यँहा प्रत्येक वस्तु का प्रतिपल परिवर्तन है, ह्रास है,नष्ट होना है,विनाश होना है,पर यह भी सत्य है कि किसी भी वस्तु की शाश्वतता,उसकी सत्ता की समाप्ति कभी नहीं होती अर्थात वह वस्तु किसी ना किसी रूप में इस जगत में ही रहती है।क्योंकि वह बनी भी तो उन अविनाशी परमतत्व से ही है।नष्ट और परिवर्तित होते हुये भी इसी सृष्टि में कहीं ना कहीं,कसी ना किसी रूप में रहती ही है।RECYCLING की प्रक्रिया उसकी होती रहती है।मैं अपनी इस बात को इस उदाहरण से इस प्रकार समझाती हूँ- एक कागज जो कि वृक्ष से प्राप्त होता है उसको जलाया गया तो वह राख में परिवर्तित हो गया,वह राख मिट्टी में मिलकर मिट्टी रूप हो गयी और पुनः मिट्टी में बीज आरोपित किया गया और वृक्ष के रूप में फिर उसकी परिणिति हुयी और पुनः लकड़ी से कागज बनाया गया।हाँलाकि वह कागज नष्ट हुआ,परिवर्तित हुआ,मिट्टी में मिला,वृक्ष बना और पुनः कागज बना,इस तरह प्रक्रियायें तो कई हुयी उस कागज की लेकिन अन्तोत्गत्वा वह इस सृष्टि में ही शाश्वत मौजूद रहा किसी ना किसी रूप में।इसी तरह उन अनन्त की,अनन्त-अनन्त क्रिया-प्रतिक्रयायें इस सृष्टि में चलती रहती हैं और हम सभी भी उत्पन्न,परिवर्तित,नष्ट होते रहते हैं और उनकी इच्क्षानुसार उन्हीं से निकले उन्हीं में समाहित हो जाते हैं।संसार के गर्भ में ना जाने क्या-क्या समाया है,कभी वह किसी रूप में प्रगट होता है तो कभी वह किसी रूप में।लीलाधार की लीला लीलाधर ही जाने। अतःसृष्टि की हर वस्तु विनाशी और परिवर्तनशील होते हुये भी शाश्वत है,अविनाशी परमतत्व की तरह। श्रीतुलसीदासजी की पंक्तिया तो देखिये------- ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशी।। जय श्री राधे ृृृृृृृृृ


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